मंजिलें ये नहीं जो मेंने है पाई
ये तकदीर ने इतनी बंदिशें क्युं है लगाई
लेकिन समंदर के उस पार तुम कितने खुश हो
मोह माया से दूर वो जोगी तुम हो
तुम्हारे पास कैसे मैं आऊं
पांवों में मेरे बेड़ियां है लगाई
कहने को तो है हाथों की चूड़ियां
मेरे लिए जैसे हथकड़ियां हो पहनाई
समाज के बेढंग रिति रिवाजों से तंग आ चुकी हूं मैं
इन्होंने मेरी रातों की नींद है चुराई
हर तरफ बिखरी है बस तन्हाई
मेरी इन बेड़ियों को खोल दो ना तुम
बंदिशों की दहलीज पार करवा दो ना तुम
दम घुटता है इस चार दीवारी में
दूर प्रक्रिति की ताजी हवा बहा दो ना तुम
लेकिन समंदर के उस पार तुम कितने खुश हो
मोह माया से दूर वो जोगी तुम हो
तुम्हारे पास कैसे मैं आऊं
पांवों में मेरे बेड़ियां है लगाई
कहने को तो है हाथों की चूड़ियां
मेरे लिए जैसे हथकड़ियां हो पहनाई
समाज के बेढंग रिति रिवाजों से तंग आ चुकी हूं मैं
इन्होंने मेरी रातों की नींद है चुराई
हर तरफ बिखरी है बस तन्हाई
मेरी इन बेड़ियों को खोल दो ना तुम
बंदिशों की दहलीज पार करवा दो ना तुम
दम घुटता है इस चार दीवारी में
दूर प्रक्रिति की ताजी हवा बहा दो ना तुम
Nice dear😍
ReplyDeleteThank you dear 😊😊
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