Pages

Tuesday, 22 September 2020

ईमान

 सब बदल देता है ये वक्त
चेहरे भी जज्बात भी

जमाने में खुशियां कम पड़ जाती है‌ लेकिन
नहीं पड़ती कम गमों की बरसात भी

करोड़ों की आबादी में सही इंसान कैसे ढूंढे 
यहां हजारों में है बिकता ईमान भी

गैरों से शिकवा क्यों करें 
जब गिराने वाले हो अपने ही

ये अहं भी इक दिन ढल जाएगा
साथ देने वाला भी साथ छोड़ जाएगा
ठीक वैसे जैसे दिन ढलने के बाद रोशनी
अमावस की रात चांद तारे
ढुंढते रह जाओगे 
पर अब नहीं मिलेगी तुम्हें अपनी ही परछाई भी





2 comments:

कुछ ख़्वाब बाकी है

  टूटे हैं ख़्वाब अभी                          पंख अभी बाकी है।। मुस्कुराहटों से मेरी खुशी मत आंकना                       थोड़ा रुको कुछ घ...