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Friday, 15 March 2019

वजूद

  हर जगह ढूंढ जब थक जाती हूं
लौट कर खुद में ही तुझको पाती हूं
चेहरे बहुत हैं नकाब ओढे़
मुझमें बस तेरा नकाब पाती हूं
लाख ताने चाहे दे ये दुनिया
तेरे जिक्र से ही मंद मंद मुस्काती हूं
निराश होकर जब हार जाती हूं
समझदारी और सूझबूझ से तुम्हारी
मुझमें मेरा वजूद पा जाती हूं
संसार के अंधकार में घिरी
बस तुझसे ही रोशनी मैं पाती हूं
ना जाने कैसे सारे झूठ पकड़ लेते हो
जब भी बनावटी मुस्कान जताती हूं
कितना सब्र है तुममें, मेरी तरह नहीं
जो याद में तुम्हारी कभी हंसती कभी रो जाती हूं।।

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