दो बादल थे जो इस कदर टकराए
पहली सी बारिश दे मिट्टी जो महकाए।।
नन्हे से बच्चे बारिश का लुत्फ उठाते
पहली सी बारिश का जश्न मनाए।।
आज भीनी सी खुशबू से घर जो महका है
लगता है मां ने पकौड़े है बनाए।।
खिड़की खोल बारिश की बूंदों को
मैं भी हाथ पर महसूस कर रही
जैसे इन मोतियों को मुट्ठी भर समेट लिया जाए।।
दूर खेत की मुंडेर पर एक चेहरा आसमान को ताके है
शायद है वह एक हलवाहा
जैसे सुकून के आंसूओं संग बारिश की बूंदों को अपनी मिट्टी में है मिलाए।।
बूंदों को झट से सोखती यह मिट्टी
जैसे प्यासे को कोई पानी है पिलाए।।
खेतों की फसल जो मुरझाई रूठी थी सबसे
यह भी आज उछल-उछल कर एक दूसरे को है मनाए
नई सी कोंपलों को यह जन्म देती
शहर में हरियाली है लाए।।
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