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Monday, 21 June 2021

दादी माँ (1942-2021)

 तुम चली गई ,तुम्हें जाना था

इक नई दुनिया को फिर अपनाना था

अफ़सोस है अंतिम घड़ी में तुम्हें चूम न पाई

सांसे कुछ अपनी तुम्हें दे न पाई


काश उस दिन मैं तुमसे दूर न जाती

काश तुम्हारे चुंबन की वो नमी महसूस कर पाती

काश तुम्हारी आवाज इस घर में कैद कर पाती

काश तुम्हारे जाने की दुआ मैंने रब से न की होती

खैर तुम्हें जाना था, तुम चली गयीं


आखिर प्रकृति के नियम से कैसे मैं छेड़छाड़ करती

जर्जर हुए तुम्हारे शरीर में कैसे नयी जान भरती

"जो इस दुनिया में आता है उसे एक न एक दिन जाना पड़ता है"

ये सब जानते हुए भी कैसे ख़ुद आज मैं संभलती


काश फिर से एक बार तुम मेरे सर पर हाथ फिराती

फिर से मेरा तुम गलत नाम पुकारती

मेरे खाने की झूठी सी तारीफ करती

काश !!! 

लेकिन तुम्हें जाना था , तुम चली गई

सांसारिक यात्रा अपनी पूरी करके 

प्रभु चरणों में विलीन हो गई


1 comment:

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