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Friday, 23 December 2022

अनाम

भूल कर जब मैं जमाना, चली थी दुनिया की दौड़ में

धीरे से हाथ सम्भाला एक गैर ने

                                        मतलबी इस दौर में

लगा  ऐसे कौन किसी की बेवजह परवाह करता है
इंसान की फितरत एसी है
                                  वो कहाँ भगवान से डरता है!
पर उसकी रूह में रूह क्यूँ रमने लगी
मैं तरंगों में उसके साथ क्यूँ बहने  लगी

नहीं बस ... अब ये मत कहना ये प्यार है
                                           आसक्ति है या ऐतबार है
लेकिन महसूस क्यूँ हो रहा जैसे
                                      ये मेरी आत्मा  का श्रृंगार है!!

दिल मन आत्मा जैसे एक बिंदु पर आकर मानें हैं
तीनों एक सीधे रास्ते की और ऊँगली ताने हैं

लेकिन शायद दिमाग अभी भी जद्दोजहद में हो
जैसे इसे भी किसी सच की तलाश हो
छाछ को भी फूकती ये चेतना
नहीं चाहती कि फिर से जलने का इसे अहसास हो!!!

ये तो पता यकीनन है ......
डामाडोल के इस समीकरण में पलड़ा किसका  भारी है

दिमाग तो एक छोटा प्यादा है
    असली खेल खेल रही जड़ चेतना ने ही बाजी मारी है!!!!


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